
उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव फिलहाल टलते हुए दिखाई दे रहे हैं। चुनावी तैयारियों के बीच योगी सरकार ने लखनऊ हाईकोर्ट की बेंच में हलफनामा दाखिल कर साफ किया है कि राज्य में एक Dedicated OBC Commission गठित किया जाएगा — और उसकी अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही चुनाव की तारीखें घोषित होंगी।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन का हवाला
सरकार का तर्क है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है। Apex Court ने साफ कहा है कि स्थानीय निकाय चुनाव से पहले एक समर्पित आयोग द्वारा पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति का अध्ययन जरूरी है।
नया आयोग ‘Rapid Survey’ करेगा, जिससे OBC आबादी का सटीक आंकलन हो सके और उसी आधार पर पंचायत सीटों का आरक्षण तय किया जा सके।
मौजूदा आयोग क्यों नहीं?
दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान ओबीसी आयोग का कार्यकाल भले ही अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दिया गया हो, लेकिन उसे समर्पित आयोग का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है।
याचिका में भी इसी मुद्दे को चुनौती दी गई थी। सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि आरक्षण की प्रक्रिया नए आयोग की सिफारिशों के बाद ही पूरी होगी।
2027 से पहले सियासी गणित?
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। कुछ जानकार मानते हैं कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव कराना सत्तारूढ़ दल के लिए रिस्की हो सकता है।

Local level पर टिकट और नेतृत्व की होड़, अंदरूनी प्रतिस्पर्धा और गुटबाजी विधानसभा की तैयारियों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में “पहले विधानसभा, फिर पंचायत” का फॉर्मूला भी चर्चा में है। यानी सवाल सिर्फ चुनाव का नहीं, टाइमिंग का भी है।
कार्यकाल खत्म, आगे क्या?
प्रदेश में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्यों का कार्यकाल मई के पहले सप्ताह में समाप्त हो रहा है।
ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल जुलाई में पूरा होगा। अगर समय पर चुनाव नहीं हुए तो सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है — जो एक अस्थायी प्रशासनिक समाधान होगा।
पिछली बार कब हुए थे चुनाव?
UP में 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतें, 3051 जिला पंचायत वार्ड, 75 जिला पंचायतें और 826 क्षेत्र पंचायतें हैं। पिछला पंचायत चुनाव 2021 में कोविड काल के दौरान चार चरणों में हुआ था। इस बार चुनाव का कैलेंडर आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
चुनाव टलना या रणनीतिक चाल?
फिलहाल तस्वीर साफ है — रिपोर्ट आएगी, तब वोट होगा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक रणनीतिक टाइमिंग भी मान रहे हैं। अब देखना यह है कि आयोग की रिपोर्ट कितनी जल्दी आती है — और क्या पंचायत चुनाव 2027 की सियासत से पहले होंगे या बाद में।
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